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अंतर धार्मिक विवाह भारतीय संस्कृति की मूल भावना के खिलाफ !

मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश सहित कुछ अन्य राज्य कथित लव जिहाद के खिलाफ कानून बनाने की तैयारी पर छिड़ी बहस 

ऐसे सभी अंतर धार्मिक विवाह सामाजिक दूरियों को पाटने और एक बेहतर समाज का निर्माण नहीं कर सकते जिसमें युवक- युवतियों को धर्म परिवर्तन करने के लिए बाध्य होना पड़े ये विवाह मूल भावना के खिलाफ है …..
कमल किशोर डुकलान 
मध्य प्रदेश,उत्तर प्रदेश में कथित लव जिहाद के खिलाफ कानून बनाने की तैयारी ने इस मामले में जारी बहस को और तेज करने का काम किया है। जहां कुछ और राज्य लव जिहाद पर कानून बनाने की बात कर रहे हैं वहीं देश के कई राजनीतिक दल इस तरह की कवायद को अनुचित बताते हुए उसे प्यार पर पहरे देने की बात कर का रहे हैं।
छल-कपट के जरिये और खासकर पहचान छिपाकर किया गया विवाह जिसमें युवक या युवती को अपना धर्म बदलने के लिए विवश होना पड़े। ऐसे अंतर धार्मिक विवाह सामाजिक दूरियों को पाटने और एक बेहतर समाज का निर्माण नहीं कर सकते अगर किसी युवक-युवती को ऐसा करने के लिए बाध्य होना पड़ता है तो फिर उस विवाह को अंतर धार्मिक विवाह नहीं कहा जा सकता। ऐसा विवाह अंतर धार्मिक विवाह की मूल भावना के खिलाफ है।
हकीकत यह है कि तमाम अंतर धार्मिक विवाहों के मामले में युवती को युवक के धर्म को स्वीकार करना पड़ता है। कई मामलों में तो इसके बगैर विवाह ही नहीं हो पाता। चूंकि ऐसा आम तौर पर हिंदू,ईसाई युवतियों की ओर से मुस्लिम युवकों से विवाह के मामले में अब तक सामने आया है, इसलिए इन दोनों समाजों की ओर से इस पर आपत्ति की जा रही है उनकी इस आपत्ति को निराधार अथवा कोरी कल्पना बताकर वस्तुस्थिति से मुंह मोड़ना है।अभी हाल में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने साफ तौर पर यह तथ्य सामने आया है कि सिर्फ विवाह करने के उद्देश्य से किया गया धर्म परिवर्तन स्वीकार्य नहीं है। ऐसे किसी प्रकार के प्रेम विवाह को प्रेम विवाह को स्वीकार नहीं किया जा सकता है जिसमें छल-कपट के बाद दिखावें के विवाह के पीछे धर्म परिवर्तन की शर्त हो?
चूंकि सभी मामलों में ऐसा नहीं होता, इसलिए हर मामले को एक ही तराजू में भी नहीं तौला जा सकता, लेकिन यदि कहीं कोई विसंगति है तो उसे दूर किया जाना चाहिए, ताकि अंतर धार्मिक विवाहों की गरिमा बनी रहे। यह गरिमा बनाने का काम अलग-अलग धर्म वाले कई युगलों ने किया भी है। ऐसे युगल विवाह बाद न केवल अपना-अपना धर्म बनाए रखते हैं, बल्कि अपने बच्चों को इसकी स्वतंत्रता भी प्रदान करते हैं कि वे जिस धर्म का चाहें, अनुसरण करें। यही आदर्श स्थिति है और इसे कायम करने के लिए, जो कुछ जरूरी हो, वह किया जाना चाहिए। जब विशेष विवाह अधिनियम अलग-अलग धर्मों को मानने वाले युगल को अपनी-अपनी धार्मिक आस्थाओं को बनाए रखते हुए विवाह की अनुमति देता है तो फिर विभिन्न मामलों में आस्था बदलने का काम क्यों हो रहा है?

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