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आपदा के जख्म और ‘सरकार’ का फैशन शो !

जिस जिले मां बहिनों की आंखें पति और बच्चों के शवों का इंतजार कर रही हों, वहां से कैसे कोई ऐसी प्रतियोगिता में हो सकता है शामिल ?
योगेश भट्ट

मुददा वाकई बेहद संवेदनशील है, पूरे देश दुनिया में जहां एक तरफ चमोली आपदा से प्रभावित आधी आबादी के साथ संवेदनाएं व्यक्त की जा रही है, तो दूसरी ओर राज्य का महिला बाल विकास विभाग संवेदनहीन बना हुआ है। कहां तो होना यह चाहिए था कि महिला एवं बाल विकास विभाग इस वक्त आपादा प्रभावित महिलाओं के साथ खड़ा होता, आपदा में घरबार, पति और बच्चों को खो चुकी मां-बहिनों के लिए योजना तैयार करता। मगर विडंबना देखिए, विभागीय मंत्री रेखा आर्या के निर्देश पर विभाग के अधिकारी इन दिनों फैशन शो की तर्ज पर परिधान प्रतियोगिता की तैयारी में जुटे हैं। राज्य के सभी जिलों से इसमें प्रतिभागियों के नाम मांगे जा रहे हैं।
कोई जरा पूछे मंत्री और विभाग के अफसरों से कि जिस जिले मां बहिनों की आंखें पति और बच्चों के शवों का इंतजार कर रही हों, वहां से कैसे कोई ऐसी प्रतियोगिता में शामिल हो सकता है ? यह आधी आबादी की संवेदनाओं के खिलवाड़ नही तो क्या है ?

इस आयोजन से राज्य की संस्कृति और परिधान को कैसे बढ़ावा मिलेगा, इसका जवाब किसी के पास नहीं है। चमोली जिले के महिला स्वंय सहायता समूहों ने इस आयोजन को शर्मनाक बताते हुए महिला विकास मंत्री पर सवाल उठाया है। उनका कहना है, कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि राज्यपाल और मुख्यमंत्री हमारा दुख बांटने पहुंची लेकिन महिला विकास की मुखिया होने के बावजूद रेखा आर्या महिलाओं की सुध लेने नहीं पहुंची।
अच्छा होता कि मंत्री दुख की इस घड़ी में आपदा प्रभावित महिलाओं के साथ हमदर्दी दिखाते हुए महिला एवं बाल विकास विभाग को आपदा पीड़ितों के साथ खड़ा करती। फैशन शो जैसे आयोजनों पर लाखों रूपये खर्च करने के बजाय विभागीय मंत्री प्रभावित महिलाओं के लिए राशन और दवाई के साथ-साथ उनके भविष्य को लेकर कोई ठोस योजना तैयार करातीं। महिलाओं ने प्रदेश के राज्यपाल और मुख्यमंत्री से गुहार लगाई है कि इस तरह के आयोजन से दुख की घड़ी में हमारे जख्मों पर नमक न छिड़कें। साथ ही उन्होंने राज्यपाल और मुख्यमंत्री से यह आयोजन निरस्त करने की मांग भी की है।
आपदा के वक्त इस तरह आयोजनों पर सवाल जायज है। जिस अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता का परिचय देते हुए उनके मुददों पर गंभीर विमर्श होना चाहिए था, उस दिन लाखों रुपये खर्च कर फैशन शो आयोजित किया जा रहा है। जिस राज्य में बीस साल बाद भी महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा के लिए कोई नीति न हो वहां इस तरह के आयोजन के आखिर क्या मायने हो सकते हैं ? साफ है कि इस आयोजन के पीछे मंशा महिला सशक्तिकरण या संस्कृति संवर्धन नहीं बल्कि कुछ और है।
कितना हास्यास्पद है कि एक ओर तो सरकार ‘घस्यारी योजना’ और भू-अभिलेखों में महिलाओं को सहखातेदार बनाने की घोषणा कर खुद को आधी आबादी के प्रति संवेदनशील दिखाने की कोशिश कर रही है, दूसरी ओर राज्य में बीस बरस बाद भी आधी आबादी की सुरक्षा और कल्याण की कोई नीति नहीं है।
सरकार लाख दावे करे, करोड़ों खर्च करे मगर सच्चाई यही है कि आधी आबादी को लेकर सरकारें गंभीर हैं ही नहीं। बीती सरकारें गंभीर होती तो पड़ोसी हिमाचल और देश के अन्य राज्यों की तरह यहां भी महिलाओं की सामाजिक सुरक्षा और आर्थिक उत्थान के लिए योजनाएं होती।
सरकारें गंभीर होती तो महिला सुरक्षा के नाम पर चलने वाले वन स्टाप सेंटर, महिला पुलिस हेल्प लाइन और 181 योजनाएं फ्लॉप नहीं होती। जिन योजनाओं में तैनात कर्मियों को वेतन तक के लाले पड़े हों तो कल्पना की जा कती है कि उन योजनाओं का क्या हाल होगा ?
और हां, मौजूदा सरकार अगर वाकई आधी आबादी को लेकर गंभीर होती तो वातानुकलित सभागारों और प्रेक्षागृहों में बैठकों और सितारा होटलों में आयोजनों के बजाय ठोस महिला नीति पर ध्यान देती। आधी आबादी को लेकर सिर्फ चुनावी साल में घोषणाएं नहीं करती बल्कि विकास की हर योजना में आधी आबादी की हिस्सेदारी और भागेदारी सुनिश्चित करती। आपदा के वक्त महिला दिवस के मौके पर फैशन शो जैसे आयोजनों पर लाखों खर्चने के बजाय आपदा प्रभावित महिलाओं के भविष्य को सुरक्षित करने पर ध्यान देती।
और अंत में.. माना सरकार तमाम विकास योजनाएं बनाती है, मगर जरा पूर्वाग्रह से अलग हटकर सोचें कि जब आधी आबादी के लिए नीति निर्धारण ही नहीं तो आखिर किस विकास की बात कर रहे हैं हम ?