महिला आरक्षण बिल पर सियासी संग्राम: हार को 2029 की जीत में बदलने की रणनीति में जुटी भाजपा
उत्तराखंड।
देश की आधी आबादी को साधने की भाजपा की रणनीति का बड़ा एजेंडा महिलाओं को 2029 के लोकसभा चुनावों में 33 प्रतिशत आरक्षण देने का मंसूबा भले ही पूरा न हो सका हो, लेकिन वह मोदी सरकार की संसद में इस पहली बड़ी हार को भविष्य की जीत का आधार बनाने की कोशिश करेगी।
इसकी शुरुआत मौजूदा पश्चिम बंगाल व तमिलनाडु के विधानसभा चुनावों से ही हो जाएगी और 2029 का लोकसभा चुनाव इसका बड़ा मंच होगा। इस दौरान भाजपा और उसके सहयोगी विपक्षी दलों पर लगातार महिला विरोधी होने का आरोप चस्पा करने की कोशिश करते रहेंगे।
विधेयक के लोकसभा में गिरने के ठीक बाद संसद में राजग के नेताओं की बैठक हुई, जिसमें आगे की रणनीति पर विचार किया गया। विपक्ष के तेवरों को देखते हुए सरकार को गुरुवार को साफ हो गया था कि उसके लिए विपक्ष के बिना दो तिहाई का समर्थन मिलना मुश्किल होगा। यही कारण रहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में विधेयक के गिरने के बाद की भाजपा की पिच तैयार कर दी, जिस पर गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष को निशाने पर लिया।
साथ ही भाजपा ने बाद की रणनीति पर काम शुरू कर दिया था। राजग की महिला सांसदों ने विधेयक के गिरने के साथ ही संसद भवन के प्रवेश द्वार पर बरसते पानी के बीच विपक्ष के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। शुक्रवार को वह विपक्षी नेताओं के घरों का घेराव करेंगी।
चुनाव प्रचार में भी बड़ा मुद्दा होगा
भाजपा देशभर में महिलाओं के धरना प्रदर्शन के जरिए विपक्ष पर महिला विरोधी होने का आरोप लगाएगी। पश्चिम बंगाल व तमिलनाडु के बाकी चुनाव प्रचार में भी यह राजग का बड़ा मुद्दा होगा।
भाजपा इस मुद्दे को 2029 के लोकसभा चुनावों तक गरमाएगी रखेगी। तब तक उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों के चुनाव में वह इसे प्रखरता से उठाएगी। जिस तरह से वह आपातकाल को लेकर कांग्रेस को घेरती है उसी तरह उसे महिला विरोधी बताने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेगी।
ताकत को बढ़ाने का काम
सूत्रों का कहना है कि भाजपा को जब 2024 में अपना बहुमत नहीं मिला तब उसके लिए विपक्ष के साथ इतने टकराव वाली स्थिति में दो तिहाई बहुमत कैसे मिल सकता था। इसलिए उसने इस विधेयक से विपक्ष को घेरने की कोशिश की और अगले चुनाव में देश की आधी आबादी को साथ लेकर फिर से अपनी ताकत को बढ़ाने का काम शुरू कर दिया है।
हालांकि विपक्ष यह सवाल भी उठा रहा है कि सरकार की मंशा राजनीति की ज्यादा थी और विधेयक पारित कराने की कम। क्योंकि उसने इसके लिए पहले से विपक्ष के साथ सार्थक संवाद ही नहीं किया। विपक्ष ने इस पर सर्वदलीय बैठक की मांग की, जिसे नहीं माना। उसने चुनावों के बाद सत्र बुलाने को कहा, उसे भी नहीं माना और तो और संसद में भी विपक्ष से अपील करने के साथ धमकाने की भाषा बोली। इससे साफ है कि वह विधेयक से सिर्फ राजनीतिक फायदा लेना चाहती थी, चाहे वह पारित होता या न होता।



