केदारनाथ आपदा के 13 साल: क्या हमने कोई सबक सीखा या फिर वही गलतियां दोहरा रहे हैं?
देहरादून/केदारनाथ। 16 और 17 जून 2013 को केदारनाथ धाम और आसपास के क्षेत्रों में आई विनाशकारी आपदा को आज 13 वर्ष पूरे हो गए हैं। इस भीषण त्रासदी में हजारों लोगों की जान चली गई, कई लोग लापता हो गए और हजारों श्रद्धालु व स्थानीय निवासी घायल हुए थे। आपदा ने केदारपुरी और मंदाकिनी घाटी में अभूतपूर्व तबाही मचाई थी, जिसके निशान आज भी लोगों की स्मृतियों में ताजा हैं।
आपदा की 13वीं बरसी पर उन सभी लोगों को श्रद्धांजलि दी जा रही है जिन्होंने इस त्रासदी में अपने प्रियजनों को खोया। साथ ही यह भी जरूरी है कि हम खुद से एक कठिन लेकिन महत्वपूर्ण सवाल पूछें—क्या आज हम 2013 की तुलना में अधिक तैयार और अधिक सुरक्षित हैं?
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल आपदा को याद करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह मूल्यांकन करना भी आवश्यक है कि सरकारों, तीर्थयात्रियों, पर्यटन से जुड़े हितधारकों और आम नागरिकों ने इस हिमालयी आपदा से वास्तव में क्या सीखा है।
यदि ईमानदारी से जवाब दिया जाए और यह सामने आए कि हमने आपदा प्रबंधन के बुनियादी ढांचे में पर्याप्त निवेश नहीं किया, विकास की नीतियों में जरूरी बदलाव नहीं किए और हमारा मुख्य लक्ष्य केवल अधिक से अधिक श्रद्धालुओं को आकर्षित करना रह गया है, तो यह चिंता का विषय है। ऐसी स्थिति में यह कहा जा सकता है कि हमने इस त्रासदी से अपेक्षित सबक नहीं सीखे हैं।
केदारनाथ आपदा केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं थी, बल्कि यह हिमालयी क्षेत्रों में विकास, पर्यावरण संरक्षण और आपदा प्रबंधन के बीच संतुलन की आवश्यकता का भी बड़ा संदेश थी।
आज, 13 वर्ष बाद, आवश्यकता है कि हम अतीत की गलतियों से सीख लेते हुए भविष्य को अधिक सुरक्षित बनाने की दिशा में गंभीर प्रयास करें।
बाबा केदार से प्रार्थना है कि वे उन सभी परिवारों को शक्ति प्रदान करें जिन्होंने इस त्रासदी में अपनों को खोया और उन घावों को भरने का संबल दें, जो इस आपदा ने हजारों लोगों के जीवन में छोड़ दिए।

