UTTARAKHAND

ऋषिगंगा में बनी झील से पानी की पूरी निकासी के प्रयास अभी से किए जाने की है जरूरत : ग्लेशियर वैज्ञानिक

ऋषिगंगा पर बनी झील से फ़िलहाल खतरा नहीं लेकिन इसका खाली किया जाना है जरूरी 

देवभूमि मीडिया ब्यूरो 

देहरादून : वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान से हाल में रिटायर हुए वरिष्ठ ग्लेशियर वैज्ञानिक डॉ. डी.पी. डोभाल आशंका जताई है कि ऋषिगंगा पर बनी झील रिसने से भले ही अभी खतरा कम है लेकिन यदि झील के मुहाने को खोलकर उसे ही जल्द खाली नहीं कराया गया तो मानसून के दौरान यही झील परेशानी बन सकती है। । उन्होंने कहा कि यह अच्छी बात है कि ऋषिगंगा पर बनी झील से लगातार रिसाव हो रहा है और अभी इससे झील का जल स्तर भी नहीं बढ़ेगा लेकिन यह तात्कालिक राहत ही है। डॉ. डोभाल का मानना है कि ऋषिगंगा पर बनी झील अभी नई है और सर्दी मौसम के कारण पानी भी ठंडा है और ठंड से मिट्टी व पत्थरों का ढ़ेर जो ग्लेशियर के साथ आया हुआ है वह भी अभी ठोस है।

डॉ. डी.पी. डोभाल बताया कि लेकिन मानसून के दौरान तेज बारिश से झील का जल स्तर तो बढ़ेगा ही वह ऊपर से आए मलबे में भी कटान कर सकता है जो झील को कमजोर करेगा जिससे पानी फोर्स के साथ झील को तोड़ कर बाढ़ ला सकती है। उन्होंने कहा कि मानसून के समय वैसे भी नदियों में जल स्तर अधिक रहता है और यदि झील भी टूट गई तो यह पानी काफी बड़ी तबाही ला सकता है। उन्होंने सुझाव दिया कि इस झील से पानी की पूरी निकासी के अभी से प्रयास किए जाने की जरूरत है। इसके साथ ही झील भविष्य में भी खतरा न बने इसके लिए अभी से प्रयास किए जाने चाहिए।

डॉ. डोभाल ने कहा कि राज्य में ग्लेशियर और इससे बनने वाली झीलों के आंकलन और अध्ययन के लिए एक स्थाई मैकनिज्म की जरूरत है। जो पूरी गंभीरता के साथ ही काम करे। जलवायु परिवर्तन या गर्मी बढ़ने की वजह से ग्लेशियर कमजोर हो रहे हैं और इस वजह से बाढ़ का खतरा लगातार बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि आपदा प्रबंधन तंत्र के तहत इस काम को बेहद गंभीरता से किए जाने की जरूरत है। क्योंकि ग्लेशियर या उसमें बनी झील से आई आपदा केवल उत्तराखंड को नहीं बल्कि पूरे देश को प्रभावित कर सकती है।

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