जिसे शिक्षा का प्रहरी बनना था जिसके सपनों में उड़ान थी जिसने हज़ारों सपने अच्छी जिंदगी के देखे थे वही हंसी प्रहरी आज हरिद्वार की गलियों, घाटों और सड़कों पर भीख मांगकर अपने और अपने छह साल के बेटे की पेट की भूख को शांत करती नज़र आती है। यह वही लड़की है जिसकी हंसी और जिसके नाम के नारों से कुमाऊं यूनिवर्सिटी का कैंपस गूंजा करता था। उसमें इतनी प्रतिभा थी और वह इतनी विलक्षण थी कि वह वर्ष 1999 -2000 में छात्र संघ की उपाध्यक्ष का चुनाव लड़ी और जीत भी गई थी। उसने राजनीति और इंग्लिश जैसे विषयों में एक बार नहीं दो बार एमए किया।
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