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मुल्तान का ऐतिहासिक प्रह्लादपुरी मंदिर: आस्था और इतिहास का एक मौन गवाह

मुल्तान, पाकिस्तान – मुल्तान के प्राचीन किले के भीतर स्थित प्रह्लादपुरी मंदिर उपमहाद्वीप की साझा सांस्कृतिक विरासत के सबसे महत्वपूर्ण लेकिन जर्जर स्मारकों में से एक है। ऐतिहासिक रूप से होली के त्योहार की जन्मस्थली के रूप में पूजनीय यह प्राचीन संरचना पौराणिक भव्यता और आधुनिक संघर्ष की कहानी बयां करती है।

नरसिंह अवतार और भक्त प्रह्लाद की गाथा

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह वही स्थान है जहाँ असुर राजा हिरण्यकश्यप के पुत्र प्रह्लाद को भगवान विष्णु ने अग्नि से बचाया था। माना जाता है कि इसी स्थान पर भगवान नरसिंह (आधे मनुष्य, आधे सिंह) एक खंभे से प्रकट हुए थे और अत्याचारी राजा का वध किया था। सदियों तक, क्षेत्र के श्रद्धालु “होलिका दहन” के प्रतीक के रूप में बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाने के लिए यहाँ एकत्र होते थे।

इतिहास के उतार-चढ़ाव

20वीं सदी में इस मंदिर का इतिहास काफी उथल-पुथल भरा रहा है:

1947 का विभाजन: भारत और पाकिस्तान के विभाजन के बाद, शहर की अधिकांश हिंदू आबादी पलायन कर गई, जिससे मंदिर स्थानीय अधिकारियों की देखरेख में रह गया।

1992 का विध्वंस: भारत में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद, जवाबी कार्रवाई में भीड़ ने प्रह्लादपुरी मंदिर को गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त कर दिया। इसका ऊंचा शिखर गिरा दिया गया और गर्भगृह को लूट लिया गया।

वर्तमान स्थिति: आज, मंदिर प्रसिद्ध बहाउद्दीन ज़कारिया की दरगाह के बगल में एक खंडहर के रूप में खड़ा है। हालाँकि इसकी छत गिर चुकी है और दीवारें ढह रही हैं, लेकिन इसके खंभे अभी भी प्राचीन वास्तुकला के प्रमाण के रूप में मौजूद हैं।

भविष्य की राह: जीर्णोद्धार या उपेक्षा?

हाल के वर्षों में, विरासत कार्यकर्ताओं और हिंदू समुदाय द्वारा इस स्थल के जीर्णोद्धार की मांग तेज हुई है। 2021 में, पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने इवैक्यूई ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड (ETPB) को इसके पुनर्वास के लिए योजना तैयार करने के निर्देश दिए थे।

यद्यपि कड़ी सुरक्षा के बीच यहाँ कभी-कभी छोटे धार्मिक अनुष्ठान होते हैं, लेकिन मंदिर अभी भी एक मौन स्मारक बना हुआ है। कई लोगों के लिए, प्रह्लादपुरी का जीर्णोद्धार केवल एक धार्मिक परियोजना नहीं है; इसे मुल्तान की बहुसांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जाता है।

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