लॉकडाउन में याद आया यह गीत, गंगा तेरा पानी अमृत, झर झर बहता जाए…
कहते हैं जो काम अरबों का प्रोजेक्ट नहीं कर पाया, उसको लॉकडाउन ने पूरा कर दिया। उनका कहना है कि यह सीधा सीधा उदाहरण है, जिससे माध्यम से साफ पता चलता है कि मानवीय दखल प्रकृति को नुकसान पहुंचा रहा था। अब विकास के बारे में हमें सभी को नये दृष्टिकोण की जरूरत है।
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