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महासागर दिवस आजः हर मिनट एक बड़ा ट्रक कूड़ा फेंका जाता है समुद्र में

प्लास्टिक के बारीक कण समुद्री जीवों के लिए बहुत बड़ा ख़तरा पैदा करते हैं, क्योंकि वो नज़र नहीं आते हैं, इसलिए उनकी तरफ़ किसी का ध्यान नहीं जाता

8 जून को विश्व महासागर दिवस है। महासागर तभी स्वच्छ रहेंगे, जब हमारी नदियां स्वच्छ और निर्मल रहेंगी। नदियों और समुद्रों में प्रदूषण मानवीय गतिविधियों से ही फैलता है और इससे जलीय जीव जंतुओं का जीवन संकट में रहता है। ऐसा नहीं है कि मनुष्य का जीवन प्रभावित नहीं होता। मनुष्य भी अपने द्वारा फैलाए गए प्रदूषण से स्वयं भी प्रभावित होता है।
संयुक्त राष्ट्र समाचार में प्रकाशित संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की एक रिपोर्ट के अनुसार, हर साल लगभग 80 लाख टन प्लास्टिक कूड़ा-कचरा समुद्रों में फेंका जाता है – इसका मतलब इस तरह भी समझा जा सकता है कि एक बड़े ट्रक में समाने वाले कूड़े-कचरे के बराबर यह हर मिनट समुद्र में फेंका जाता है.
समुद्री किनारों, उनकी सतहों और ज़मीन पर जो कूड़ा-कचरा इकट्ठा होता है उसमें से 60 से 90 फ़ीसदी हिस्सा प्लास्टिक से बना हुआ होता है. इस कूड़े-कचरे में सबसे आम चीज़ें होती हैं – सिगरेट के अधजले हिस्से, बैग, और खाने-पीने की चाज़ों के इस्तेमाल होने वाले डिब्बे।
इसके परिणामस्वरूप समुद्री कूड़ा-कचरा वहाँ जीवित रहने वाली 800 से भी ज़्यादा प्रजातियों के लिए ख़तरा पैदा करता है. इनमें से 15 प्रजातियाँ विलुप्ति के कगार पर हैं।
पिछले 20 वर्षों के दौरान तो प्लास्टिक के बारीक कणों और सिर्फ़ एक बार ही इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक को फेंके जाने से ये समस्या और भी ज़्यादा गंभीर हो गई है।
ज़्यादातर लोग समुद्रों में प्लास्टिक से पैदा होने वाले प्रदूषण को इससे जोड़ते हैं कि समुद्रों के तटों पर किस तरह का कू़ड़ा-कचरा डाला जाता है और समुद्री सतहों पर क्या तैरता है, लेकिन यह तो स्पष्ट है कि प्लास्टिक के बारीक कण बहुत बड़ा ख़तरा पैदा करते हैं, क्योंकि वो नज़र नहीं आते हैं, इसलिए उनकी तरफ़ किसी का ध्यान भी नहीं जाता है।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने प्लास्टिक से होने वाले नुक़सान के बारे में जागरूकता अभियान शुरू किया था, जिसका नाम है – “What’s in Your Bathroom?” “आपके बाथरूम में क्या है?” इसमें कहा गया है कि रोज़मर्रा इस्तेमाल होने वाली चीज़ों में अक्सर प्लास्टिक का बहुत बड़ा हिस्सा होता है और ये चीज़ें लोगों के स्वास्थ्य के लिए ख़ासा नुक़सान कर सकती हैं।
साथ ही लोगों से ये भी कहा जा रहा है कि किस तरह उनके प्रयासों से प्लास्टिक की मौजूदगी और स्वास्थ्य व पर्यावरण पर उसके नुक़सान को कम करने में किस तरह से दिशा बदली जा सकती है.
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने वर्ष 2017 में स्वच्छ समुद्र अभियान शुरू किया था, जिसके तहत सिर्फ़ एक बार इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक और उसके बारीक कणों से निपटने के लिए विश्व स्तर पर मुहिम शुरू करने का आह्वान किया गया था। समुद्री कूड़े-कचरे के विभिन्न पहलुओं और उसके नुक़सान पर प्रकाश डाला जा रहा है, जैसे कॉस्मेटिक उद्योग यानी श्रृंगार व प्रसाधन वस्तुओं से पैदा होने वाला प्लास्टिक प्रदूषण।
बहुत से लोगों को तो ये जानकारी ही नहीं होती है कि रोज़ाना इस्तेमाल होने वाली चीज़ों में कितनी प्लास्टिक होती है जो वो अपने चेहरे और शरीर की देखभाल के लिए प्रयोग करते हैं। चीज़ों की पैकेजिंग से लेकर उनकी सुंदरता बढ़ाने के लिए इस्तेमाल होने वाले बारीक कण, जो अक्सर पानी के साथ बह जाने के लिए बनाए जाते हैं, ये अंत में नदियों में और सबसे आख़िर में समुद्रों में पहुँचते हैं।
माइक्रोप्लास्टिक यानी प्लास्टिक के बारीक कण इतने छोटे होते हैं कि उन्हें कूड़े-कचरे के प्रबंधन में शामिल ही नहीं किया जा सकता। इतना ही नहीं, वो बारीक कण जल आधारित कई ज़हरीले पदार्थों और बैक्टीरिया को आकर्षित करते हैं। ये खाद्य पदार्थों जैसे नज़र आते हैं, उन्हें मछलियाँ, अन्य कीड़े-मकोड़े व अन्य समुद्री जीव खा लेते हैं. इससे उनकी पाचन प्रक्रिया और तंत्र प्रभावित होते हैं  जिससे उन्हें कई तरह की दिक्कतों को झेलना पड़ता है। .
समुद्री जीवन को ख़तरा पैदा करने के अलावा माइक्रोप्लास्टिक का इंसानी स्वास्थ्य पर कितना असर होता है, अभी इस बारे में ठोस जानकारी नहीं है. लेकिन ये माइक्रोप्लास्टिक कपड़ों, खाद्य-पदार्थों, पानी और कॉस्मेटिक्स यानी प्रसाधन चीज़ों में इस्तेमाल होती हैं तो इनके हानिकारक प्रभाव भी काफ़ी ज़्यादा होने की संभावनाएं हैं।

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