नारी शक्ति वंदन अधिनियम: समानता, सशक्तिकरण और विकसित भारत का संकल्प
!!नारी शक्ति वंदन अधिनियम समानता का जयघोष!!
(डॉ.कमल किशोर डुकलान ‘सरल’)
संसद में नारी शक्ति वंदन अधिनियम केवल एक विधायी सुधार नहीं,बल्कि विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने वाला मील का पत्थर भी है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम संशोधन से भारतीय नारी को नीति निर्धारण के सर्वोच्च मंचों पर न्यायसंगत स्थान दिलाना है।
“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः” भारतीय सनातन संस्कृति में नारीशक्ति को पूजनीय और शक्तिस्वरूपा कहा गया है। ‘नृ’ धातु से बना नारी शब्द का अर्थ ही है नेतृत्व करने वाली नारीशक्ति से है। प्राचीन भारत में लोपामुद्रा, मैत्रेयी और गार्गी,अपाला, मुग्द्लानी जैसी अनेक नारियों ने तत्कालीन समाज,राजनीति तथा दर्शन को नई दिशा प्रदान करने में अपनी महति भूमिका निभाई। स्वाधीनता के आंदोलन में भी हमारी नारी शक्ति ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। दुर्भाग्य से स्वतंत्रता के बाद राजनीतिक नेतृत्व के स्तर पर महिलाओं का स्थान गौण होता गया।
कई दलों ने इस समस्या को स्वीकार तो जरूर किया, लेकिन वे इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं कर सके। वर्तमान सरकार ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम के रूप में महिलाओं के लिए लोकसभा और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करके देश की नारियों को वह स्थान दिलाया, जिसकी वे हकदार थी। लोकसभा,विधानसभाओं में महिलाओं को नेतृत्व देकर अब बारी इसके क्रियान्वयन की है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में न्याय की अवधारणा समानता की नींव पर टिकी होती है। यदि महिला और पुरुष के राजनीतिक प्रतिनिधित्व में असमानता रहेंगी तो वह व्यवस्था सच्चे अर्थों में लोकतांत्रिक नहीं कहलाएगी। नारी शक्ति वंदन अधिनियम राजनीतिक समानता का जयघोष है। इससे भारतीय नारी को नीति निर्धारण के सर्वोच्च मंचों पर न्यायसंगत स्थान मिलेगा। इससे लोकतंत्र को व्यापक प्रतिष्ठा प्राप्त होगी।
इस अधिनियम की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि देखें तो इसका सफर 30 वर्षों से भी ज्यादा लंबा रहा। अनेक दलों के घोषणापत्रों का अंग होते हुए भी यह मुद्दा हाशिए पर रहा। अनेकों बार तो संसद में राजनैतिक दलों द्वारा इसका विरोध देखने को भी मिला।
मोदी सरकार ने 2023 में सभी दलों को महिला आरक्षण के लिए राजी कर नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (106वां संवैधानिक संशोधन) पारित कर लोकसभा तथा विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रविधान किया।
निःसंदेह त्रिस्तरीय पंचायतों में 50 प्रतिशत महिलाओं की भागीदारी के अच्छे परिणाम देखने को मिल रहे हैं,पर नीति निर्माण की शीर्ष प्रक्रिया में महिलाओं की भूमिका अब तक लगभग नगण्य थी। वर्तमान में लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी को देखें तो वह 15 प्रतिशत से भी कम है।
नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (106वां संवैधानिक संशोधन) पारित होने से लोकसभा की सीटें मौजूदा 543 से बढ़ाकर 850 हो जाएंगी। इसी तरह विधानसभाओं में भी सीटें बढ़ेंगी। इससे नीति-निर्माण के स्तर पर महिलाओं की आवाज सशक्त होगी।
राजनीतिक प्रक्रिया में नारियों के आगमन से संवेदनशीलता,धैर्य तथा करुणा जैसे मूल्यों का समावेश होता है। भारतीय स्त्री जैसे समर्पण के साथ नारी जिस प्रकार एक कुशल गृहिणी होने के नाते अपने परिवार का भरण-पोषण करती है, ठीक उसी प्रकार एक महिला विधायक या सांसद अपने क्षेत्र की प्राथमिक समस्याओं को सूक्ष्मता से समझ कर उसका निष्पादन कर सकती है।
समाजविज्ञानी अध्ययनों के अनुसार जब सत्ता में महिलाओं की भागीदारी होती है तो सार्वजनिक क्षेत्रों जैसे शिक्षा,जन स्वास्थ्य सुविधाओं,पेयजल आपूर्ति आदि पर अधिक निवेश होता है।
केन्द्र सरकार की लोकांक्षी योजनाओं में महिला सशक्तीकरण के लिए पूर्ण प्रयास हो रहे हैं। समाज के वंचित वर्गों की महिलाओं को मुख्यधारा में शामिल करने की दिशा में जो योजनाएं चल रही हैं। उनमें अनेकों योजनाओं से करोड़ों महिलाएं लाभान्वित हुई हैं। महिलाओं के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को नारी शक्ति वंदन अधिनियम पूर्णता प्रदान करता है। यह अधिनियम महिलाओं को ‘वोट बैंक’ से ऊपर उठाकर ‘शक्ति केंद्र’ के रूप में स्थापित करने का संदेश है।
महिलाओं को विधायी शक्ति मिलने से उनके विरुद्ध होने वाले अपराधों, संपत्ति के अधिकारों और कार्यस्थल पर सुरक्षा जैसे विषयों पर अधिक प्रभावी कानून बनाए जाने की संभावना बढ़ेगी।
जब महिलाएं नीति-निर्धारक बनेंगी, तो वे महिला उद्यमिता, स्वयं सहायता समूहों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने वाली नीतियों को और सशक्त तरीके से लागू करने का प्रयास करेंगी। आधी आबादी की आर्थिक भागीदारी से भारतीय अर्थव्यवस्था की भी रफ्तार बढ़ सकती है।
नारी शक्ति वंदन अधिनियम केवल एक विधायी सुधार नहीं, बल्कि विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने वाला मील का पत्थर भी है। यह जरूरी है कि इस अधिनियम को यथाशीघ्र लागू किया जाए, क्योंकि महिलाएं अपनी राजनीतिक भागीदारी के लिए लगभग 30 वर्षों से इंतजार कर रही हैं।
संसद में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लागू करने हेतु यह आवश्यक था कि जनगणना और परिसीमन प्रक्रिया पूर्ण हो, पर जनगणना में देरी के कारण परिसीमन में समय लगता और अगले आम चुनाव में महिला आरक्षण लागू नहीं हो पाता।
इसीलिए नारी शक्ति वंदन अधिनियम में संशोधन की पहल की गई। इससे परिसीमन या सीटों का निर्धारण नई जनगणना के बजाय 2011 की जनगणना के आधार पर किया जाएगा। इस कदम से अधिनियम लागू करने में होने वाली देरी से बचा जा सकेगा।
प्रधानमंत्री मोदी ने यह उचित ही अपील की है कि सभी दल दलगत हितों से ऊपर उठकर इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर एकजुटता दिखाएं। आशा है कि संसद के विशेष सत्र में कोई भी दल इसमें बाधा नहीं बनेगा, क्योंकि यह भारतीय नारियों के राजनीतिक सशक्तीकरण ही नहीं उनके चतुर्दिक विकास का भी प्रश्न है।



