देहरादून।
अपनी अनोखी मिठास और खुशबू के लिए देशभर में प्रसिद्ध देहरादून की लीची अब अंतरराष्ट्रीय बाजार में नई पहचान बनाने जा रही है। पहली बार देहरादून से करीब 1000 किलो लीची की खेप इटली भेजी गई है। यह सिर्फ एक फल का निर्यात नहीं, बल्कि उत्तराखंड के किसानों की मेहनत, आधुनिक तकनीक और वैश्विक बाजार में बढ़ते विश्वास की सफलता की कहानी है।
वर्षों से देहरादून की लीची अपनी खास गुणवत्ता के लिए जानी जाती रही है। हालांकि, यह फल बेहद नाजुक होने के कारण पेड़ से तोड़ने के कुछ दिनों बाद ही इसकी गुणवत्ता प्रभावित होने लगती थी। यही वजह थी कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी मांग होने के बावजूद इसे दूर-दराज के देशों तक पहुंचाना चुनौतीपूर्ण माना जाता था।
अब बेहतर कोल्ड चेन सिस्टम और आधुनिक पैकेजिंग तकनीक ने इस चुनौती को अवसर में बदल दिया है। एपीडा (APEDA) के सहयोग से इस बार लीची को विशेष तकनीक के साथ पैक किया गया है, जिससे इसकी ताजगी और गुणवत्ता लंबे समय तक बरकरार रह सके। विशेषज्ञों का दावा है कि नई तकनीक के जरिए लीची को 10 दिनों या उससे अधिक समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
पूरे परिवहन के दौरान लगभग 5 डिग्री सेल्सियस तापमान बनाए रखा जाता है, जिससे फल की गुणवत्ता प्रभावित नहीं होती। इसका मतलब है कि अब देहरादून की लीची की मिठास केवल भारत तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यूरोप के लोग भी इसका स्वाद चख सकेंगे।
यह उपलब्धि उत्तराखंड की बागवानी और कृषि क्षेत्र के लिए एक नई दिशा साबित हो सकती है। यदि यह प्रयास सफल रहता है, तो आने वाले समय में देहरादून की लीची दुनिया के कई अन्य देशों के बाजारों में भी दिखाई दे सकती है। उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष एपीडा के माध्यम से देहरादून की लीची दुबई भी निर्यात की गई थी।
देहरादून की लीची का इटली पहुंचना इस बात का उदाहरण है कि जब पारंपरिक उत्पादों को आधुनिक तकनीक और बेहतर प्रबंधन का साथ मिलता है, तो पहाड़ों से निकलने वाले उत्पाद भी दुनिया के बड़े बाजारों तक अपनी पहचान बना सकते हैं।



