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विजयादशमी का सामाजिक महत्त्व

कमल किशोर डुकलान
वैदिक काल से भारतीय संस्कृति में विजयदशमी का पर्व वीरता का पूजक एवं शौर्य की उपासक रहा है। हमारी संस्कृति कि गाथा इतनी निराली है कि देश के अलावा विदेशों में भी इसकी गुंज सुनाई देती है इसीलिए भारत को विश्व गुरु के रूप में माना है।
भारत के प्रमुख पर्वो में से दशहरा को विजयादशमी के रुप में मनाया जाता है। दशहरा केवल त्योहार ही नही बल्कि इसे कई बातों का प्रतीक भी माना जाता है।
दशहरें में रावण के दस सिर काम,क्रोध, लोभ,मोह,हिंसा,आलस्य,झूठ,अहंकार,मद और चोरी को दस पापों का सूचक माना जाता है। इन सभी पापों से हम किसी न किसी रूप में मुक्ति चाहते हैं और इस आशा में प्रतिवर्ष रावण का पुतला बड़े से बड़ा बना कर जलाते हैं ताकि हमारी सारी बुराइयाँ भी इस पुतले के साथ अग्नि में भष्म हो जाये।
लेकिन क्या ऐसा होता है क्या? नहीं,क्योंकि अगर हमारी व समाज की बुराइयाँ सच में रावण के पुतले के साथ अग्नि में स्वाह होती तो क्या हम प्रतिवर्ष रावण के पुतले को बड़े से बड़ा बनाते? कभी नही,इसका अर्थ यह निकलता है कि हम मानते और जानते है कि समाज में दिनों-दिन बुराइयाँ व असमानताएँ भी रावण के पुतले कि तरह निरन्तर बड़ी होती चली जा रही है। तर्क तो यह है कि हम इन पर्वों पर केवल परंपरा के रुप में ही मनाते हैं। इन त्योहारों से मिले संकेत और संदेशों को हम अपने जीवन में उतारते नहीं हैं।
विजयदशमी का पर्व हमें यह संदेश देता है कि “अन्याय और अधर्म का विनाश तो हर हाल में सुनिश्चित है। फिर चाहे आप दुनियाभर की शक्तियों और प्राप्तियों से संपन्न ही क्यों न हो,अगर आपका आचरण सामाजिक गरिमा या किसी भी व्यक्ति विशेष के प्रति गलत होता है तो आपका विनाश भी तय है।”दशहरा यानी न्याय, नैतिकता,सत्यता,शक्ति और विजय का पर्व है लेकिन आज हम इन सभी बातों को भूलकर अपने त्योहारों को सिर्फ़ मनोरंजन के लिए सीमित रखते हैं।हर युग में अन्याय, अहंकार,अत्याचार,असमानता,छुआछूत और आतंकवाद जैसे कलंक रूपी असुर रहे हैं।इसका हमारा इतिहास गवाह है:-त्रेता युग में रावण,मेघनाथ,ताड़का आदि द्वापर युग में कंस,पूतना,दुर्योधन,शकुनी आदि और आज के इस कलियुग में क्षेत्रवाद, जातिवाद,आंतक,भय,अन्याय,शोषण और अलवाद जैसे असुर समाज में पनपते जा रहे हैं।
त्रेतायुग में श्री राम को और द्वापरयुग में श्री कृष्ण को अच्छाई का प्रतीक माना गया है क्योंकि भगवान राम ने मानव रूप में मर्यादा का आचरण तथा भगवान कृष्ण ने बालरुप में अपनी इच्छा शक्ति के बल पर अधर्म पर धर्म कि विजय प्राप्त की थी। श्री राम और श्री कृष्ण जैसे वीर भी जीवन-संघर्ष से वंचित नहीं रह पाये,हम तो सामान्य मनुष्य है फिर हम जीवन-संघर्ष से कैसे बच सकते है.? अगर हमें श्री राम का संपूर्ण जीवन आदर्श और मर्यादा की शिक्षा देता है कि हर व्यक्ति के जीवन में सुख-दुख तो आते-जाते रहेंगे क्योंकि यह तो सृष्टि का अटल नियम है।लेकिन हमें अपना जीवन सब परेशानियों के होते हुए भी हिम्मत और आशा के साथ ही नहीं जीना है बल्कि इस जीवन को ईश्वरीय देन समझ कर सार्थक भी बनाना है।
महर्षि बाल्मीकि ने रामायण में भगवान श्री राम और रावण दोंनो को ही भगवान शिव का उपासक होने का उल्लेख किया है। लेकिन समाज में दोंनो की व्याख्या अलग-अलग होती है। क्योंकि रावण की साधना और भक्ति स्वार्थ,मान,सत्ता, भोग-विलास और समाज को दुख देने हेतु थी जबकि श्री राम की साधना परोपकार, न्याय,मर्यादा,शांति,सत्य और समाज कल्याण के उद्देश्य के लिए थी। इसीलिए इतने वर्षों बाद दशहरे पर सनातनी हिन्दू समाज रावण का पुतला दहन भगवान श्री राम के जयकारे से साथ अंत करते हैं। दशहरे के इस पावन पर्व पर हम सब यह सोचने के लिए बाध्य हो कि देश और समाज कि प्रगति के लिए हम अपनी सभी बुराइयों को भी रावण के पुतले के साथ सदा-सदा के लिए जला देंगे और समाज व देश कि उन्नति के लिए कार्य करेंगे, तभी हमारी सही मायने में रावण पर विजय होगी।
हिन्दू रीती-रिवाजों के अनुसार विजयदशमी के दिन शास्त्र पूजन के साथ बच्चे का अक्षरारंभ,नया व्यवसाय का आरंभ नई फसलों के बीज बोना आदि शुरू किये जाते हैं। कहा जाता है इस दिन जिस भी कार्य का प्रारंभ किया जाता है उसमे सफलता अवश्य मिलती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डाक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने संघ की स्थापना विजयदशमी के दिन ही की थी।
दशहरा के दिन अलग-अलग हिस्सों में मेले लगते है,रामलीला का आयोजन होता है और रावण, मेघनाद व् कुंभकरण के पुतले जलाए जाते हैं। जबकि दूसरी ओर इस दिन आदि शक्ति मां दुर्गा पूजा का भी आयोजन किया जाता है। माना जाता है भगवान राम ने रावण से युद्ध से पूर्व नदी तट पर बैठकर नौ दिनों तक माँ दुर्गा की पूजा की थी। तभी से दशहरा से पहले नवरात्रि मनाई जाती है। यह पर्व व्यक्ति को अपने भीतर से दस प्रकार के पाप:-काम,क्रोध,लोभ,मोह,मद,मत्सर,अहंकार, आलस्य,हिंसा और चोरी के परित्याग का प्रेरणा देता है।
हमारा देश भारत युवाओं का देश है और युवा ही भारत का भविष्य हैं,अगर युवा पीढ़ी अपनी सोच में बदलाव लाएगी तो समाज में बुराई का असुर रावण पूर्ण रूप से समाप्त हो जायेगा। दशहरे के त्योहार के प्रति आदर,सम्मान व प्यार को रखते हुए,हम अपने जीवन को अच्छा बनाने कि ओर अग्रसर करेंगे। हमें स्वंय को बदलना है किसी ओर को नहीं क्योकि हमारे अंदर आया बदलाव ही हमारे अन्दर का रावण का अंत करना है।
इसी उद्देश्य को लेकर भारत में दशहरे का असली महत्व और अर्थ समझा जा सकता है। विजय का प्रतीक विजयदशमी का पावन पर्व भगवान श्री राम सभी को सत्य,ज्ञान तथा आदिशक्ति मां नवदुर्गा सभी को अजय शक्ति प्रदान करें।

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