इसका एक जीता जागता उदाहरण है – 10 अप्रैल 2020 को सिंगरौली में रिलायंस का राखड़ का बांध टूटा और गांव में ‘राख की बाढ़’ आ गई, इस हादसे में छह लोगों की मौत हो गई है , कई मकान भी राख के दलदल में समाहित हो गए। गौरतलब है कि ऐश डैम (राखड़ बांध) में बिजली संयंत्रों में कोयले के जलने के बाद निकली राख जिसे फ्लाई ऐश भी कहा जाता है, को जमा किया जाता है। जिसे ऐश डाइक कहते हैं। फ्लाई ऐश एक खतरनाक प्रदूषक है जिसमें अम्लीय, विषाक्त और रेडियोधर्मी पदार्थ तक होते हैं। इस राख में न सिर्फ़ सीसा, आर्सेनिक, पारा, और कैडमि
हेल्थी एनर्जी इनीशिएटिव इंडिया और कम्युनिटी एनवायरमेंटल मॉनिटरिंग की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार 2010 से जून 2020 के बीच देशभर में कम से कम 76 प्रमुख फ्लाई ऎश डाईक दुर्घटनाएं हुई। “कोल ऐश इन इंडिया- ए कम्
कैंब्रिज (यू के) के हेल्थ केयर सलाहकार डॉक्टर मनन गांगुली ने कहा-” कुल मिलाकर कोल ऐश नुकसानदेह न दिखते हुए भी एक धीमा ज़हर है आमतौर पर कोयले की राख में अन्य कार्सिनोजेन और न्यूरोटॉक्सिंस के साथ शीशा ,पारा, सेलेनियम ,हेक्सावे
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