₹1000 करोड़ स्वाहा, फिर भी मैली है मां गंगा! CAG की रिपोर्ट ने उत्तराखंड की कार्यप्रणाली को किया नग्न—जिम्मेदार कौन?

नेहा जोशी
उत्तराखंड: नमामि गंगे परियोजना की विफलता पर कैग (CAG) की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा
देहरादून: नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) द्वारा मार्च 2026 में पेश की गई एक रिपोर्ट ने उत्तराखंड में ‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम के दावों की पोल खोल दी है। रिपोर्ट के अनुसार, 2018 से 2023 के बीच ₹1,000 करोड़ का बजट आवंटित होने के बावजूद, राज्य की एजेंसियां योजना के लक्ष्यों को पूरा करने में विफल रही हैं।
रिपोर्ट की मुख्य बातें:
गंगा में सीधा कचरा: ऋषिकेश, रुद्रप्रयाग और गोपेश्वर जैसे क्षेत्रों में 12 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) बिना उपचार के सीधा कचरा गंगा नदी में बहाते पाए गए।
अधूरा निर्माण और लापरवाही: 18 प्लांट निर्माण में कमियों के कारण कभी चालू ही नहीं हो पाए। साथ ही, 8 एसटीपी बिना प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की अनिवार्य अनुमति के 4 साल से ज्यादा समय तक चलते रहे।
बजट का सही उपयोग नहीं: वनीकरण और नदी सुधार के लिए आवंटित फंड का केवल 16% ही इस्तेमाल किया गया, जिससे परियोजना की गति बेहद धीमी रही।
सुरक्षा में चूक और हादसे: सुरक्षा ऑडिट न होने के कारण 2021 में रुद्रप्रयाग में भूस्खलन से एक प्लांट नष्ट हो गया, वहीं 2023 में चमोली एसटीपी हादसे में 16 लोगों की जान चली गई।
शून्य कनेक्टिविटी: सात शहरों में बने 21 नए एसटीपी से एक भी घर नहीं जोड़ा गया, जिससे करोड़ों की लागत से बना ढांचा बेकार पड़ा है।
कैग की यह रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि कार्यान्वयन एजेंसियों की लापरवाही के कारण उत्तराखंड में गंगा को स्वच्छ करने का मिशन अपने उद्देश्य से भटक गया है।



