भारत में कुश्ती गांव-गांव में प्रचलित है। हर गांव में सुबह और शाम नवयुवक अखाड़े में व्यायाम करते मिल जाते हैं; पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की इसमें कोई पहचान नहीं थी। इस पहचान को दिलाने का श्रेय गुरु हनुमान को है। उनका असली नाम विजय पाल था; पर आगे चलकर यह नाम लुप्त हो गया।
कुश्ती को समर्पित गुरु हनुमान अविवाहित रहे। अपने शिष्यों को ही वे पुत्रवत स्नेह करते थे। वे पूर्ण शाकाहारी थे तथा इस मान्यता के विरोधी थे कि मांसाहार से ही शक्ति प्राप्त होती है। वे प्रातः तीन बजे उठ कर शिष्यों के प्रशिक्षण में लग जाते थे। उनके अखाड़े के छात्र अपना भोजन स्वयं बनाते थे। अनुशासनप्रिय गुरु जी दिनचर्या में जरा भी ढिलाई पसंद नहीं करते थे।
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