क्या मोदी सरकार द्वारा लाभ कमाने वाली सरकारी कंपनी को बेचना सही फैसला है?
हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा किए गए एक विनिवेश (Disinvestment) निर्णय ने नई बहस को जन्म दे दिया है। उत्तराखण्ड के अल्मोड़ा में स्थापित आयुर्वेदिक और यूनानी दवाओं के निर्माण की प्रमुख सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी इंडियन मेडिसिन्स फार्मास्युटिकल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (IMPCL) का निजीकरण कर दिया गया है।
वर्ष 1983 से लगातार लाभ में चल रही और मिनी रत्न का दर्जा प्राप्त इस कंपनी में सरकार की 100 प्रतिशत हिस्सेदारी को लगभग 121 करोड़ रुपये में निजी कंपनी को बेच दिया गया।
इस फैसले को लेकर कई राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और स्थानीय नेताओं ने गंभीर सवाल उठाए हैं। आलोचकों का कहना है कि करीब 145 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य वाली कंपनी को कम कीमत पर बेचा गया है। साथ ही यह भी सवाल उठाए जा रहे हैं कि क्या यह सौदा जनहित में है, कर्मचारियों की नौकरी कितनी सुरक्षित रहेगी और इस प्रक्रिया में पारदर्शिता कितनी बरती गई।
विरोध करने वालों का दावा है कि आयुष मंत्रालय की ओर से पूर्व में कंपनी को तत्काल बेचने की कोई योजना नहीं होने की बात कही गई थी, लेकिन इसके बावजूद निजीकरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया।
अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या लाभ में चल रहे सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण देश की आर्थिक प्रगति के लिए आवश्यक है, या फिर ऐसे सरकारी संस्थानों को संरक्षित रखा जाना चाहिए ताकि वे सस्ती और सुलभ स्वास्थ्य सेवाओं तथा रोजगार सुरक्षा में अपनी भूमिका निभाते रहें?
क्या मुनाफे में चल रही सरकारी कंपनियों को बेचना आर्थिक सुधारों की दिशा में सही कदम है, या फिर यह सार्वजनिक संपत्तियों के निजीकरण की चिंताजनक प्रवृत्ति है?

