न्यायालयीन वादों की आड़ में पदोन्नति और स्थानांतरण ठप रखना उचित नहीं : डॉ. अंकित जोशी
राजकीय शिक्षक संघ एससीईआरटी शाखा के निवर्तमान अध्यक्ष डॉ. अंकित जोशी ने विद्यालयी शिक्षा विभाग में पदोन्नति, स्थानांतरण एवं सेवा संबंधी मामलों से जुड़े माननीय न्यायालयों में लंबित वादों पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि किसी भी विभाग की प्रशासनिक दक्षता का आकलन इस बात से किया जाता है कि वह न्यायालयीन चुनौतियों के बीच भी अपनी व्यवस्थाओं को कितना गतिशील बनाए रखता है।
उन्होंने कहा कि विगत वर्षों में विद्यालयी शिक्षा विभाग में अनेक महत्वपूर्ण प्रक्रियाएँ जैसे पदोन्नति और स्थानांतरण आदि न्यायालयीन वादों के कारण प्रभावित बताई जाती रही हैं, किंतु केवल किसी विषय के न्यायालय में लंबित होने मात्र से विभागीय कार्यवाहियों को अनिश्चितकाल तक स्थगित रखना न तो प्रशासनिक दृष्टि से उचित है और न ही शिक्षा व्यवस्था के हित में। विभाग का दायित्व है कि वह लंबित वादों की प्रभावी एवं समयबद्ध पैरवी सुनिश्चित करे तथा उपलब्ध वैधानिक विकल्पों के माध्यम से पदोन्नति एवं स्थानांतरण जैसी आवश्यक प्रक्रियाओं को गतिमान बनाए रखे।
डॉ. जोशी ने कहा कि नई चुनौती एलटी संवर्ग के सहायक अध्यापकों के लिए टीईटी की अनिवार्यता का है । यह भविष्य में हजारों शिक्षकों के सेवा हितों एवं पदोन्नति की संभावनाओं को प्रभावित करने वाला गंभीर मुद्दा है। दुर्भाग्यवश इस विषय पर अपेक्षित स्तर की चर्चा, जागरूकता एवं समाधानोन्मुख पहल दिखाई नहीं देती। उन्होंने कहा कि किसी भी समस्या का समाधान तभी संभव है जब उसकी गंभीरता को स्वीकार करते हुए समय रहते उसके व्यावहारिक और वैधानिक समाधान तलाशे जाएँ।
उन्होंने प्रश्न उठाया कि वर्तमान में ऐसा कौन-सा विशिष्ट न्यायालयीन अवरोध है जो एलटी से प्रवक्ता पदों पर पदोन्नति की प्रक्रिया को रोके हुए है। यदि कोई विधिक बाधा विद्यमान है तो उसकी स्पष्ट जानकारी शिक्षक समाज के समक्ष रखी जानी चाहिए तथा उसके त्वरित निराकरण हेतु ठोस कार्ययोजना भी प्रस्तुत की जानी चाहिए। वहीं यदि ऐसी कोई प्रत्यक्ष बाधा नहीं है, तो वर्षों से लंबित पदोन्नति प्रक्रिया को और अधिक विलंबित करने का कोई औचित्य नहीं बनता।
डॉ. जोशी ने कहा कि शिक्षक का कैरियर केवल व्यक्तिगत उन्नति का विषय नहीं है, बल्कि विद्यालयी शिक्षा की गुणवत्ता, शिक्षक मनोबल और विद्यार्थियों के भविष्य से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ है। जिस व्यवस्था में शिक्षकों की पदोन्नतियाँ, स्थानांतरण और सेवा संबंधी अवसर वर्षों तक लंबित रहते हैं, वहाँ शिक्षा व्यवस्था का प्रभावित होना स्वाभाविक है।
उन्होंने विभाग, शासन और शिक्षक संगठनों से अपेक्षा व्यक्त की कि न्यायालयीन वादों को निष्क्रियता का आधार बनाने के बजाय उनके त्वरित एवं वैधानिक समाधान की दिशा में सार्थक पहल की जाए, ताकि शिक्षकों के वैध अधिकारों की रक्षा हो सके और विद्यालयी शिक्षा व्यवस्था में अपेक्षित गतिशीलता एवं विश्वास पुनः स्थापित किया जा सके।
डॉ० जोशी का मानना है कि न्यायालयीन लंबितता का सम्मान आवश्यक है, किंतु उसे प्रशासनिक निष्क्रियता का स्थायी आधार बना देना किसी भी व्यवस्था के हित में नहीं हो सकता।

