उत्तराखंड।
पुलिस, IAS अधिकारी, इंजीनियर, ट्रैफिक पुलिसकर्मी और अन्य सरकारी कर्मचारी—आजकल सोशल मीडिया पर रील और शॉर्ट वीडियो बनाते हुए अक्सर दिखाई देते हैं। ऐसे में एक बड़ा सवाल उठ रहा है कि सरकारी नौकरी का उद्देश्य जनता की सेवा है या सोशल मीडिया पर व्यूज़, लाइक्स और फॉलोअर्स जुटाना?
सोशल मीडिया जनजागरूकता और नागरिकों से संवाद का एक प्रभावी माध्यम हो सकता है, लेकिन कई लोगों का मानना है कि ड्यूटी के दौरान सरकारी कर्मचारियों का पूरा ध्यान अपने आधिकारिक कार्यों पर होना चाहिए। उनका तर्क है कि जनता के टैक्स से वेतन पाने वाले कर्मचारियों की प्राथमिक जिम्मेदारी सार्वजनिक सेवाओं को बेहतर ढंग से उपलब्ध कराना है, न कि सोशल मीडिया कंटेंट बनाना।
यह बहस किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश में चर्चा का विषय बन चुकी है। कुछ लोग मानते हैं कि सोशल मीडिया का जिम्मेदारी से उपयोग पारदर्शिता और जनसंपर्क बढ़ा सकता है, जबकि अन्य लोगों का कहना है कि इससे कामकाज प्रभावित होता है और सरकारी संस्थाओं की पेशेवर छवि पर असर पड़ता है।
कई लोग मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सराहना कर रहे हैं कि उन्होंने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया, जिस पर लंबे समय से खुलकर चर्चा नहीं हो रही थी। अब बहस केवल सोशल मीडिया की नहीं, बल्कि सरकारी संस्थाओं में जवाबदेही, अनुशासन और जनता के भरोसे को बनाए रखने की है।
आपकी क्या राय है? क्या सरकारी कर्मचारियों को ड्यूटी के दौरान रील बनाने की अनुमति होनी चाहिए, या फिर जनसेवा पर पूरा ध्यान सुनिश्चित करने के लिए सख्त नियम लागू होने चाहिए?

