जीतेन्द्र अंथवाल
देहरादून : ऐसी ‘डबल इंजन’ की सरकार भी किस काम की, जो पहाड़ पर आकाशीय बिजली से गंभीर रूप से झुलसकर तड़पते घायलों के लिए 20 घंटे बाद भी एक अदद ‘डबल इंजन का हेलीकॉप्टर’ तक मुहैया न करा सके? ये उत्तराखंड है जनाब, यहां हेलीकॉप्टर नेताओं की मौज-मस्ती के लिए होते हैं।
यहां हेलीकॉप्टर, निजी हेली कंपनियों की खूली लूूट के लिए होते हैं। यहां हेलीकॉप्टर सरकारों और उसके मुखिया की पोताबंरी करने वाले मीडिया के एक खास वर्ग की अय्याशी के लिए होते हैं। यहां हेलीकॉप्टर आपदा या गंभीर हादसों के पीड़ितों को त्वरित राहत पहुंचाने-उन्हें रेस्क्यू करने के लिए नहीं मिल पाते। उत्तरकाशी जिले के मोरी क्षेत्र में हिमाचल बॉर्डर से सटे चांगशिल ट्रैक पर कल शाम आकाशीय बिजली गिरी। यह बिजली उस तंबू पर गिरी, जिसमें 10 ग्रामीण रूके हुए थे।
चांगशिल बुग्याल सरकार की ओर से इस साल के लिए ‘ट्रैक ऑफ द ईयर’ घोषित किया गया है। संभवत: इसी की तैयारी के लिए ये ग्रामीण वहां गए या भेजे गए थे। झुलसे ग्रामीणों में एक का मोबाइल किसी तरह काम कर रहा था, सो उसने कल शाम साढ़े 5 बजे यह घटना घटित होते ही जहां मुमकिन हुआ सूचना पहुंचाई। सूचना 6 बजते-बजते तक उत्तरकाशी प्रशासन को भी मिल चुकी थी। मौके के लिए रेस्क्यू टीम भेजने की कवायद हुई, मगर यह टीम आज दोपहर 12 बजे तक भी नहीं पहुंची। ये उस उत्तराखंड के सरकारी सिस्टम का हाल है, जो हर साल आपदा से घिरा रहता है और जिसने वर्ष-2013 में अब तक की सबसे भीषण आपदा झेली है।
आकाशीय बिजली से झुलसे ग्रामीणों को जब सरकारी निकम्मेपन की वजह से चिकित्सीय अथवा किसी भी तरह की मदद नहीं मिल पाई, तो घंटों तड़पने के बाद आज सुबह तक तीन घायलों ने दम तोड़ दिया। वह तो भला हो हिमाचल प्रदेश के रोहड़ू प्रशासन का, जिसके दो डॉक्टर और एकाधिक पुलिसकर्मी तड़के पांच बजे पैदल रवाना हुए और करीब पौने 11 बजे सुबह मौके पर पहुंचकर 7 अन्य घायलों को प्राथमिक उपचार दे पाए। प्रदेश में डबल इंजन की सरकार और उत्तरकाशी प्रशासन का हाल यह रहा कि वह डबल इंजन के एक हेलीकॉप्टर तक का इंतजाम दोपहर तक नहीं कर पाई।
20 घंटे बाद दोपहर हेलीकॉप्टर का जुगाड़ किसी तरह हो पाया। उधर, राज्य आपदा न्यूनीकरण एवं प्रबंधन केंद्र और उत्तरकाशी पुलिस के जिला कंट्रोल रूम का हाल यह था कि वहां दोपहर 12 बजे तक सिर्फ 3 लोगों के झुलसे होने और उन्हें कल शाम ही रेस्क्यू कर लिए जाने की सूचना थी। यह अलग बात है कि अभी किसी नेता के परिवार को सैर-सपाटे के लिए जरूरत होती, तो मिनटों में डबल इंजन के हेलीकॉप्टर का जुगाड़ हो जाता।
सवाल यह भी उठता है कि आपदा प्रबंधन विभाग के अधिकारी, आपदा प्रबंधन करना तो दूर, जब सूचनाओं तक से अपडेट नहीं रहते, तो ऐसे महकमें की जरूरत ही क्या है? क्या आपदा प्रबंधन विभाग का कार्य सिर्फ एनजीओ को लाभ पहुंचाना, फिल्में बनवाना, पत्रक छपवाना भर है? और सरकार…? वह क्या सिर्फ शोक व्यक्त करने और मृतकों-घायलों के लिए सहायता राशि की घोषणा करने भर के लिए है? क्या इसी लापरवाह और लचर सिस्टम के भरोसे पहाड़ में ट्रैकिंग, पर्यटन और अन्य साहसिक गतिविधियों को बढ़ावा देने का राग अलापा जाएगा?

