कागज़ों में अस्पताल, हकीकत में खाली ज़मीन! इंदौर के खजराना अस्पताल पर उठे सवाल
मध्य प्रदेश के इंदौर में खजराना सिविल अस्पताल का मामला अब शासन, योजना निर्माण और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। कांग्रेस ने इसे नौकरशाही की बड़ी विफलता बताते हुए कहा है कि भर्ती, तबादलों और सरकारी रिकॉर्ड का तालमेल परियोजना की वास्तविक प्रगति के साथ होना चाहिए था।
पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा ने सवाल उठाया कि जिस अस्पताल के लिए आज तक ज़मीन भी उपलब्ध नहीं हो सकी, उसके लिए सरकारी विभाग लगातार तबादले कैसे जारी करते रहे। उनके मुताबिक यह कोई मामूली प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि व्यवस्था में गहरी लापरवाही का उदाहरण है।
विपक्ष ने ऐलान किया है कि आगामी विधानसभा सत्र में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया जाएगा और उन प्रशासनिक फैसलों की विस्तृत जांच की मांग की जाएगी, जिनकी वजह से छह वर्षों तक यह परियोजना केवल कागज़ों पर ही चलती रही।
वहीं, प्रशासनिक विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी स्थिति तब पैदा हो सकती है जब किसी परियोजना को प्रशासनिक मंजूरी मिलने के बाद स्टाफ स्वीकृति, कैडर प्रबंधन, बजट आवंटन और विभागीय रिकॉर्ड जैसी प्रक्रियाएं अपने-अपने स्तर पर चलती रहें, जबकि ज़मीन अधिग्रहण या निर्माण कार्य किसी कारण से रुक जाए।
स्वास्थ्य विभाग अक्सर भविष्य में भर्ती में देरी से बचने के लिए अस्पताल शुरू होने से पहले ही स्टाफ के पद स्वीकृत कर देता है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि जब ज़मीन अधिग्रहण और निर्माण में कोई ठोस प्रगति नहीं हुई, तब भी नियुक्तियां और तबादले जारी रखना प्रशासनिक समन्वय, निगरानी और सार्वजनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
राजनीतिक विवाद से इतर, खजराना, मुसाखेड़ी, तेजाजी नगर, बिचौली हाप्सी और आसपास के इलाकों के लोगों को आज भी उस सरकारी अस्पताल का इंतज़ार है, जिससे इंदौर के पहले से ही दबाव झेल रहे सरकारी स्वास्थ्य तंत्र को राहत मिलने की उम्मीद थी।
द लॉजिकल इंडियन का दृष्टिकोण
खजराना सिविल अस्पताल की कहानी सिर्फ एक ऐसे भवन की नहीं है जो अब तक बना ही नहीं, बल्कि यह उन खाइयों को भी उजागर करती है जो सरकारी घोषणाओं, प्रशासनिक प्रक्रियाओं और आम लोगों की वास्तविक जरूरतों के बीच पैदा हो जाती हैं।
सरकार का यह पक्ष भी महत्वपूर्ण है कि अस्पताल के लिए स्वीकृत स्वास्थ्यकर्मियों को फिलहाल अन्य अस्पतालों में प्रभावी ढंग से तैनात किया गया है। लेकिन यह मामला इस बात की भी याद दिलाता है कि आधारभूत ढांचे की योजना, भूमि प्रबंधन और मानव संसाधन प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय बेहद जरूरी है।
सार्वजनिक संस्थाएं तभी प्रभावी ढंग से काम करती हैं जब पारदर्शिता और जवाबदेही भी उनके साथ चलें। लोगों को यह जानने का अधिकार है कि गलती कहां हुई और सरकार उसे सुधारने के लिए क्या कदम उठा रही है। भारत के शहर तेजी से बढ़ रहे हैं और बेहतर सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे में सिर्फ बजट मंजूर करना या पद सृजित करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि अस्पतालों जैसी महत्वपूर्ण परियोजनाओं को समय पर पूरा करना भी उतना ही आवश्यक है।



