“विविधा”
(चिंतन,संस्कृति और समाज का सार्थक दस्तावेज)
…… लेखकीय….
भारत वह देश है जिसका अध्यात्म दर्शन एक ब्रह्म को विविध रूपों में देखता है। यहां विविधता में एकता नहीं अपितु वह एक तत्व विविध रूपों में प्रकट होता है। इस प्रकार भारत उस विशाल देश का नाम है जिसमें विविधता एक ही मूल से उपजी है। भारत के लिए ‘विविधता’ केवल एक शब्द नहीं, बल्कि यह इसकी आत्मा है। चिरपुरातन काल से ही भारत विभिन्न धर्म,भाषा,संस्कृति और परंपराओं को अपने अन्त:करण में समेटे हुए है। भारत ने ‘एकता में विविधता’ का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत किया है। वर्तमान आधुनिक समय में, इसकी विविधता का सम्मान करते हुए उसे अपनी शाश्वत अस्मिता के रूप में स्वीकार करना आज की परम आवश्यकता बन गया है।
भारतवर्ष एक ही मूल से निकले पौधों के अलग अलग रंगों के सुन्दर सुंदर फूलों का गुलदस्ता है। यहां की असली खूबसूरती इसके विविध रंगों में है। कश्मीर से कन्याकुमारी गुजरात से अरुणाचल और अटक से कटक तक,हर किलोमीटर पर यहां की बोली भाषा,खान-पान और वेशभूषा बदल जाती है। भारत की यही विविधता हमें विश्व की संस्कृतियों में अद्वितीय बनाती है। यह हमें सिखाती है कि अलग होने का मतलब विपरीत होना नहीं है। जब हम अपनी सांस्कृतिक पहचान के साथ-साथ दूसरों की परंपराओं और जीवन चर्या का सम्मान करते हैं, तभी हमारा राष्ट्र निश्चित ही मजबूत होता है।
आज के दौर में,जब संकीर्ण विचारधाराएं,भाषावाद, प्रांतवाद और क्षेत्रवाद, स्वार्थ परखता से सिर उठा रहे हैं,जो हमारी एकता और अखंडता के लिए एक चुनौती बनती जा रही हैं इसके साथ ही यह हमारे विकसित राष्ट्र के लिए अवरोधक भी है। आज भारत की विविधता के सामने खतरा पैदा हो गया है। अक्सर देखा जाता है कि सामाजिक समरसता को तोड़ने के लिए समय-समय पर विचारों के मतभेदों को बढ़ावा दिया जाता है। आज यह अत्यंत आवश्यक हो गया है,कि हम उन तत्वों को पहचानें जो हमारी एकता और अखंडता को कमजोर करना चाहते हैं। भारत की असली ताकत उसकी एकता में ही निहित है, न कि एकरूपता में।
विविधता का सम्मान करने का अर्थ है-समावेशी दृष्टिकोण का होना। हर धर्म और क्षेत्र को राष्ट्र निर्माण में समान अवसर और सम्मान मिलना चाहिए। समावेशी दृष्टिकोण ही सामाजिक समरसता का मार्ग प्रशस्त करता है। हमें अपनी विविधता को एक ‘समस्या’ के रूप में नहीं, बल्कि एक ‘अवसर’ के रूप में देखना चाहिए। एक ऐसा भारत, जहाँ विभिन्न विचार एक साथ मिलकर राष्ट्र की प्रगति में योगदान दे सकें, वही हमारे देश की वास्तविक विविधता है।
विविध आलेखों का संग्रह”विविधा” पुस्तक रूप में संरक्षित करने का मुख्य उद्देश्य पाठकों के सामने विभिन्न अनुभवों और दृष्टिकोण को प्रस्तुत करना है। पुस्तक में लिखित आलेखों द्वारा समाज में घटित अनेक सामाजिक ज्वलंत मुद्दों के साथ शिक्षा , साहित्य,पर्यावरण, पर्व – त्यौहार, जीवन – शैली , सामाजिक रिश्ते ,नैतिक शिक्षा, समरस समाज ,छात्रों की परीक्षाएं, उत्तराखंड की जागर लोक-संस्कृति , प्राचीन बेड़ा लोक-परंपरा एवं उत्तराखण्डी लोक गीतों का राजनैतिक,आंदोलनों से रहा पुराना नाता जैसे पुस्तक में वर्णित लेखों का समाज, राजनीति में सुधार एवं जन-जागरूकता के माध्यम से समाज को जागरूक व संवेदनशील बनाना पुस्तक में वर्णित आलेखों को लिखने का मुख्य संदेश है।
विविधता हमारी विरासत है और एकता हमारा भविष्य। हमें अपनी विविध पहचानों के प्रति गर्व होना चाहिए और साथ ही, एक अखंड भारत के निर्माण के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए। जब हम विविधता को एक शक्ति के रूप में स्वीकार करेंगे, तभी हम दुनिया में अपनी विशिष्ट पहचान को और अधिक मजबूती से स्थापित कर पाएंगे।
उत्तराखंड भाषा संस्थान देहरादून के सहयोग से मेरी प्रथम गद्य कृति ” भारतीय पर्व एवं उत्सव -एकता और सद्भावना के प्रतीक” नामक पुस्तक के प्रकाशन पर मैं उन सभी शिक्षाविद स्वनाम धन्य विद्वत जनों का ह्रदय तल की गहराइयों से आभारी हूं जिन्होंने मेरी प्रथम गद्य कृति पर मुझे अपने आशीर्वाद रुप में शुभकामना संदेशों,प्रस्तावना एवं मीमांसा के रुप में अपने भाव अभिव्यक्त कर मुझे आशीर्वाद प्रदान किया साथ ही मैं उन सभी हित चिंतक पाठकों का भी आभारी हूं जिन्होंने पुस्तक में वर्णित विभिन्न पर्व एवं उत्सवों पर आधारित मेरे आलेखों को पसंद किया और मुझे अगली गद्य कृति लेखों का संग्रह “विविधा” नामक संकलन करने के लिए मुझे प्रेरित किया।

मैं आभार व्यक्त करना चाहूंगा मायावती ढकरियाल निदेशक उत्तराखंड भाषा संस्थान देहरादून का जिन्होंने मुझे उत्तराखंड के नवोदित साहित्यकारों की सूची में सम्मिलित कर मेरी प्रथम गद्य कृति “भारतीय पर्व एवं उत्सव -एकता और सद्भावना के प्रतीक” नामक कृति को अनुदान श्रेणी में सम्मिलित कर पुस्तक प्रकाशन के लिए मुझे आर्थिक सहयोग प्रदान किया। प्रातः स्मरणीय चरण वन्दनीय जन्मदात्री मां श्रीमती सावित्री देवी जी का भी आभारी हूं जो मुझे साहित्य लेखन के रूप में निरन्तर आगे बढ़ने के लिए तन मन धन से मेरे नवाचारी प्रयोग के लिए मेरे साथ हर समय खड़ी रहती है। मैं अपनी जीवन संगिनी शिक्षिका श्रीमती मीरा कमल डुकलान का भी आभार व्यक्त करुंगा जो मुझे साहित्य लेखन के क्षेत्र में मुझे सहारा प्रदान करती है। मुझे आशा है कि सम-सामयिक तात्कालिक विषयों विषयों पर संकलित मेरी पुस्तक “विविधा” पाठकों की समझ को व्यापक बनाने में सहायक सिद्ध होगी। पुस्तक पर आपके बहुमूल्य सुझावों और प्रतिक्रिया का सदैव स्वागत है।
डॉ.कमल किशोर डुकलान ‘सरल’

