सभ्यता और संस्कृति को समानार्थी समझ लिया जाता है,जबकि ये दोनों हैं अलग-अलग अवधारणाएं
कमल किशोर डुकलान
वसुधैव कुटुम्बकम की संस्कृति जीवन की एक उत्तम विधि है। संस्कृति ही हमारे जीने और सोचने के तरीके को विकसित करती है। सभ्यता और संस्कृति को समानार्थी समझ लिया जाता है,जबकि ये दोनों अलग-अलग अवधारणाएं हैं।
आदि भौतिक संस्कृति को संस्कृति और भौतिक संस्कृति को सभ्यता के नाम से विभाजित किया जाता है। संस्कृति के ये दो पक्ष एक-दूसरे से अलग हैं। संस्कृति में परंपरागत चिंतन, कलात्मक अनुभूति, विस्तृत ज्ञान एवं धार्मिक आस्था का समावेश है।
अनेक प्रकार की ऐतिहासिक परंपराओं से गुजरकर और विभिन्न भौगोलिक परिस्थितियों में रहकर संसार के अनेक समुदायों ने मानवीय संस्कृति के अलग-अलग पक्षों से साक्षात किया है।अनेक प्रकार की धार्मिक साधनाओं, कलात्मक प्रयत्नों, सेवाभक्ति तथा योग मूलक अनुभूतियों के भीतर से मनुष्य उस महान सत्य के व्यापक और परिपूर्ण रूप को प्राप्त करता है,जिसे हम व्यापक ‘संस्कृति’ के रुप में जानते हैं।
अनेक प्रकार की ऐतिहासिक परंपराओं से गुजरकर और विभिन्न भौगोलिक परिस्थितियों में रहकर संसार के अनेक समुदायों ने मानवीय संस्कृति के अलग-अलग पक्षों से साक्षात किया है।अनेक प्रकार की धार्मिक साधनाओं, कलात्मक प्रयत्नों, सेवाभक्ति तथा योग मूलक अनुभूतियों के भीतर से मनुष्य उस महान सत्य के व्यापक और परिपूर्ण रूप को प्राप्त करता है,जिसे हम व्यापक ‘संस्कृति’ के रुप में जानते हैं।



