रानी कर्णावती, जिसने 30 हजार मुगल सैनिकों की कटवा दी थी नाक
गढ़वाल की रानी कर्णावती को नाक काटी रानी भी कहा जाता है
गढ़वाल की वीरांगना रानी कर्णावती को इतिहास में “नाक काटी रानी” के नाम से जाना जाता है। उन्होंने मुगल सेना को ऐसी शिकस्त दी थी, जिसे वे कभी भूल नहीं पाए। रानी कर्णावती पंवार वंश के राजा महिपत शाह की पत्नी थीं। राजा महिपत शाह के वीरगति को प्राप्त होने के बाद उन्होंने अपने सात वर्षीय पुत्र पृथ्वीपति शाह की ओर से गढ़वाल राज्य की बागडोर संभाली।
साल 1640 में नजाबत खान के नेतृत्व में मुगल सेना ने गढ़वाल पर आक्रमण किया। रानी कर्णावती ने अपनी सूझबूझ और पराक्रम से मुगल सेना का डटकर सामना किया। लेखक निकोलो मनुची ने अपनी पुस्तक में भी इस युद्ध का उल्लेख किया है। रानी ने सीधे युद्ध के बजाय कूटनीति का सहारा लिया और मुगल सेना को अपनी सीमा में प्रवेश करने दिया। जब सेना लक्ष्मणझूला और ऋषिकेश से आगे बढ़ी तो उसके आगे और पीछे के सभी रास्ते बंद कर दिए गए। पहाड़ी क्षेत्रों और गंगा के किनारे के मार्गों से अनभिज्ञ मुगल सैनिकों की रसद सामग्री समाप्त होने लगी और उनकी स्थिति कमजोर पड़ती चली गई।
मुगल सेना की हालत खराब होने पर नजाबत खान ने संधि का प्रस्ताव भेजा, जिसे रानी कर्णावती ने अस्वीकार कर दिया। इसके बाद रानी ने संदेश भिजवाया कि मुगल सैनिकों को जीवनदान दिया जा सकता है, लेकिन इसके लिए उन्हें अपनी नाक कटवानी होगी। पराजित और निराश मुगल सैनिकों ने अपने हथियार डाल दिए। बताया जाता है कि लगभग 30 हजार से अधिक मुगल सैनिकों की नाक काटी गई थी, जिनमें नजाबत खान भी शामिल था।
नाक कटने के अपमान को नजाबत खान सहन नहीं कर पाया और मैदानों की ओर लौटते समय उसने आत्महत्या कर ली। कहा जाता है कि इसके बाद मुगलों की हिम्मत नहीं हुई कि वे कुमाऊं-गढ़वाल की ओर आंख उठाकर देख सकें। मुगल बादशाह शाहजहां ने रानी कर्णावती को ‘नाक कटी रानी’ कहकर संबोधित किया, लेकिन यही उपाधि आगे चलकर उनकी वीरता और पराक्रम की पहचान बन गई।
रानी कर्णावती का यह साहसिक इतिहास आज भी उत्तराखंड के गौरव और स्वाभिमान का प्रतीक माना जाता है।



