स्थानांतरण प्रक्रिया को अधिनियम, न्यायालय के आदेशों एवं प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप बनाया जाए : डॉ. अंकित जोशी
देहरादून।
राजकीय शिक्षक संघ के प्रांतीय महामंत्री पद के प्रत्याशी डॉ. अंकित जोशी ने उत्तराखण्ड लोक सेवकों के लिए वार्षिक स्थानांतरण अधिनियम, 2017, माननीय उच्च न्यायालय द्वारा समय-समय पर पारित आदेशों, कार्मिक एवं सतर्कता विभाग द्वारा निर्गत निर्देशों तथा शासन एवं महानिदेशक, विद्यालयी शिक्षा द्वारा जारी आदेशों का विस्तृत अध्ययन करने के उपरांत कहा कि स्थानांतरण प्रक्रिया केवल समय-सीमा के भीतर संपन्न होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसका विधिसम्मत, पारदर्शी, वस्तुनिष्ठ, समानतापूर्ण एवं प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप होना भी अनिवार्य है।
डॉ. जोशी ने कहा कि उच्च न्यायालय ने अपने विभिन्न आदेशों में स्पष्ट किया है कि स्थानांतरण का आधार सुगम एवं दुर्गम क्षेत्रों का वर्गीकरण नहीं बनाया जा सकता, परंतु न्यायालय ने कहीं भी यह निर्देश नहीं दिया कि कर्मचारियों की पूर्व सुगम अथवा दुर्गम सेवा का अभिलेख समाप्त कर दिया जाए अथवा उसका प्रकटीकरण न किया जाए। न्यायालय ने केवल इतना कहा है कि सुगम-दुर्गम वर्गीकरण स्थानांतरण का आधार नहीं होगा, जबकि विभाग अन्य वैधानिक एवं प्रशासनिक आधारों पर स्थानांतरण करने के लिए पूर्णतः स्वतंत्र है।
उन्होंने कहा कि यदि किसी कर्मचारी ने वर्षों तक दुर्गम अथवा अतिदुर्गम क्षेत्रों में सेवाएँ दी हैं तो वह उसकी सेवा का तथ्यात्मक अभिलेख है। उस तथ्य का संधारण एवं प्रकटीकरण और उसे स्थानांतरण का एकमात्र आधार बनाना—दो अलग-अलग बातें हैं। न्यायालय ने दूसरे पर रोक लगाई है, पहले पर नहीं।
डॉ. जोशी ने कहा कि विभाग द्वारा जारी आवेदन प्रपत्र में कर्मचारी की पूर्व सेवा का ऐसा कोई विवरण नहीं माँगा गया है, जिससे सक्षम प्राधिकारी को यह ज्ञात हो सके कि संबंधित कर्मचारी ने किन क्षेत्रों में, कितनी अवधि तक एवं किन परिस्थितियों में सेवाएँ प्रदान की हैं। इससे निर्णय प्रक्रिया के समक्ष महत्वपूर्ण तथ्य उपलब्ध ही नहीं होंगे और सक्षम प्राधिकारी का निर्णय अधूरी जानकारी पर आधारित होने की संभावना बनी रहेगी।
उन्होंने कहा कि विभाग के आदेश में यह भी स्पष्ट नहीं किया गया है कि कुल कितने स्थानांतरण किए जाएंगे, कितनी रिक्तियाँ उपलब्ध हैं तथा क्या आवेदन करने वाले सभी पात्र कर्मचारियों का स्थानांतरण किया जाएगा। यदि पात्र आवेदकों की संख्या उपलब्ध रिक्तियों से अधिक होगी तो चयन किस आधार पर होगा, इसका भी कोई उल्लेख आदेश में नहीं है।
डॉ. जोशी ने कहा कि स्थानांतरण अधिनियम के अनुसार अंतिम निर्णय सक्षम प्राधिकारी द्वारा लिया जाना है, किंतु आदेश में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि सक्षम प्राधिकारी किन वस्तुनिष्ठ मानदंडों के आधार पर विभिन्न पात्र आवेदकों में चयन करेगा। पाँच पात्र श्रेणियों का उल्लेख कर देना पर्याप्त नहीं है; यदि प्रत्येक श्रेणी में अनेक पात्र कर्मचारी होंगे तो उनकी प्राथमिकता किस प्रकार निर्धारित होगी, यह पूर्णतः अस्पष्ट है।
उन्होंने कहा कि फलित रिक्तियों के संबंध में भी आदेश पूर्णतः मौन है। यदि किसी कर्मचारी का स्थानांतरण होता है तो उसके स्थान पर उत्पन्न रिक्ति का उपयोग किस प्रकार किया जाएगा, क्या वह भी स्थानांतरण प्रक्रिया का भाग बनेगी अथवा केवल प्रारंभिक रिक्तियों तक ही प्रक्रिया सीमित रहेगी—इस संबंध में कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश उपलब्ध नहीं हैं। फलित रिक्तियों को सम्मिलित किए बिना स्थानांतरण प्रक्रिया अपने वास्तविक उद्देश्य को पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं कर सकती।
डॉ. जोशी ने कहा कि स्थानांतरण प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण आधार पारदर्शिता है, किंतु वर्तमान आदेश में न तो काउंसलिंग प्रणाली का कोई प्रावधान किया गया है और न ही किसी वैकल्पिक पारदर्शी आवंटन प्रणाली का। यदि पात्र आवेदकों की संख्या उपलब्ध रिक्तियों से अधिक होगी तो किस कर्मचारी का स्थानांतरण किस विद्यालय में किया जाएगा, इसका कोई पूर्वनिर्धारित, सार्वजनिक एवं वस्तुनिष्ठ मानदंड उपलब्ध नहीं है। ऐसी स्थिति में स्थानांतरण का अंतिम निर्णय पूर्णतः सक्षम प्राधिकारी के विवेक पर निर्भर हो जाएगा। इससे समान परिस्थितियों वाले कर्मचारियों के साथ भिन्न-भिन्न व्यवहार की आशंका उत्पन्न हो सकती है, जो स्थानांतरण अधिनियम की पारदर्शी एवं निष्पक्ष व्यवस्था की भावना के अनुरूप प्रतीत नहीं होती।
उन्होंने कहा कि आदेश में चयन के मानदंड, उपलब्ध रिक्तियों का सार्वजनिक विवरण, प्राथमिकता निर्धारण की कार्यप्रणाली, विद्यालय आवंटन की प्रक्रिया तथा अंतिम चयन सूची तैयार करने की पारदर्शी व्यवस्था का भी कोई उल्लेख नहीं है। इससे पूरी प्रक्रिया में अनावश्यक विवाद एवं भ्रम की संभावना बनी रहती है।
डॉ. जोशी ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न उठाते हुए कहा कि विभाग द्वारा स्पष्ट किया गया है कि स्थानांतरण प्रक्रिया पोर्टल पर उपलब्ध सेवा विवरण के आधार पर संपन्न की जाएगी। ऐसे में यह आवश्यक है कि सबसे पहले पोर्टल पर उपलब्ध समस्त प्रविष्टियों का विभागीय स्तर पर सत्यापन एवं ऑडिट कराया जाए।
वर्षों के दौरान विभिन्न स्तरों पर दर्ज की गई प्रविष्टियों में त्रुटि, अपूर्णता अथवा तथ्यात्मक विसंगति की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। यदि अप्रमाणित अथवा त्रुटिपूर्ण आंकड़ों के आधार पर स्थानांतरण किए जाते हैं तो अनेक पात्र कर्मचारियों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत भी यही अपेक्षा करता है कि जिस अभिलेख के आधार पर किसी कर्मचारी के अधिकार निर्धारित किए जा रहे हों, उसकी शुद्धता एवं सत्यता का विभाग द्वारा प्रमाणीकरण किया जाए तथा आवश्यकता पड़ने पर संबंधित कर्मचारी को संशोधन एवं आपत्ति प्रस्तुत करने का अवसर भी उपलब्ध कराया जाए।
डॉ. जोशी ने कहा कि स्थानांतरण अधिनियम, 2017 का उद्देश्य केवल स्थानांतरण कराना नहीं, बल्कि पारदर्शी, निष्पक्ष, समानतापूर्ण एवं विवादरहित स्थानांतरण व्यवस्था स्थापित करना है। अतः स्थानांतरण प्रक्रिया में प्रत्येक निर्णय का स्पष्ट एवं पूर्वनिर्धारित आधार होना चाहिए, जिससे समान परिस्थितियों वाले कर्मचारियों के साथ समान व्यवहार सुनिश्चित किया जा सके।
उन्होंने शासन एवं विभाग से आग्रह किया कि स्थानांतरण प्रक्रिया को अंतिम रूप देने से पूर्व एक विस्तृत मानक कार्यप्रणाली (एसओपी) जारी की जाए, जिसमें—
– उपलब्ध एवं फलित रिक्तियों का स्पष्ट निर्धारण,
– पोर्टल पर उपलब्ध समस्त सेवा विवरण का विभागीय सत्यापन एवं ऑडिट,
– कर्मचारियों को त्रुटि सुधार एवं आपत्ति का अवसर,
– पात्र कर्मचारियों के चयन हेतु वस्तुनिष्ठ एवं सार्वजनिक मानदंड,
– विभिन्न श्रेणियों के मध्य प्राथमिकता निर्धारण की स्पष्ट व्यवस्था,
– विद्यालय आवंटन हेतु काउंसलिंग अथवा अन्य समान रूप से पारदर्शी प्रणाली,
– सक्षम प्राधिकारी द्वारा विवेकाधिकार के प्रयोग के स्पष्ट मानदंड,
– तथा अंतिम चयन सूची एवं स्थानांतरण आदेशों के सार्वजनिक प्रकटीकरण की व्यवस्था स्पष्ट रूप से निर्धारित की जाए।
डॉ. जोशी ने कहा कि उनका उद्देश्य स्थानांतरण प्रक्रिया का विरोध करना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि पूरी प्रक्रिया उत्तराखण्ड लोक सेवकों के लिए वार्षिक स्थानांतरण अधिनियम, 2017, उच्च न्यायालय के आदेशों तथा प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप संचालित हो, जिससे प्रत्येक पात्र शिक्षक के साथ न्याय हो तथा भविष्य में अनावश्यक विवादों एवं न्यायालयीन वादों की संभावना न्यूनतम रह सके।



